चेम्मीन का युग परिवेश
समाज के यथार्थ को प्रतिबिंबित करने वाला दर्पण है साहित्य| इसकी कितनी ही विधाएं हैं और कितने ही अंग| नाटक की बात की जाए या कहानियों की, या कविताओं की,या आलोचनाओं की, या उपन्यासों की साहित्य ने हर जगह, हर समय एक युग प्रेक्षक की भूमिका निभाई है |इसने युग को दर्शाया है और अपने समाज को चित्रित किया है|
आज हम चर्चा करेंगे मलयालम साहित्य की एक विशिष्ट और महत्वपूर्ण रचना ' चेम्मीन और उसके युग परिवेश की '
'तकषि' अर्थात शिवशंकर पिल्लै द्वारा रचित 'चेम्मीन' उपन्यास मलयालम साहित्य की अमर कीर्ति है |कल्पना से दूर संकल्पनाओं के पात्रों से परे यह उपन्यास यथार्थवादीता का जीता जागता उदाहरण है | अति सरलीकृत दृष्टि से रचा गया यह उपन्यास नैतिकता वादी मूल्यों से परे है|
एक हिंदू लड़की तथा एक मुस्लिम लड़के की प्रेम कथा पर आधारित यह उपन्यास छद्म साहित्यिक चिंताओं से पूर्णता मुक्त है इसमें लेखक ने केरल के तटीय मछुआरों के जीवन को उजागर करने के साथ-साथ सामाजिक वर्जनाओं को उकरते हुएँ प्रेम और समाज में प्रेमी जोड़े के संघर्ष को उजागर किया है |
हिंदू मछुआरे 'चेम्बन कुंजू 'की बेटी 'करूतम्मा 'को अपने बचपन के मुस्लिम साथी 'परीकुट्टी' से प्रेम हो जाता है| वह भी एक मछुआरा ही रहता है |किंतु करूतम्मा के माता - पिता उसका विवाह 'पलनी' से कर देते हैं| अन्य मछुआरों से अपनी पत्नी और उसके प्रेम की कहानी सुनकर पलनी को क्रोध आता है, एक बच्चा हों जाने के बाद भी लोगो का मुँह बंद ना होता, पलनी से यह बदनामी बर्दाश्त ना हो पाती है |उपन्यास में यह भी दर्शाया गया है कि किस प्रकार से अन्य मछुआरे उसका हुक्का पानी तक बंद कर देते हैं और पलनी एक रात समुंद्र में जाता है और वापस लौटकर नहीं आता क्योंकि सार्क उसकी नाव उलट देती है और समुद्र में डूब जाने से उसकी मौत हो जाती है |उसी रात करूतम्मा अपने प्रेम को परीकुट्टी के प्रति प्रकट करती है और 2 दिनों बाद समुद्र तट पर करूतम्मा और परीकुट्टी की लाश आलिंगनबद्ध स्थिति में मिलती है|
उपर्युक्त उपन्यास में तकषि जी ने एक मिथक की भी संकल्पना की है जो थोड़ा अटपटा सा लगता है |यह मिथक समुंद्र देवी के गुस्से से संबंधित है |उपन्यासकार ने दर्शाया है कि समुद्र देवी उस मछुआरे को नष्ट कर देती हैं जिसकी पत्नी अपवित्र हो जाती है|
इस उपन्यास के प्रकाशन के बाद सबसे अधिक चर्चा और विवाद इसी मिथक को लेकर हुआ
कि क्या यह उपन्यास केवल मिथकीय ढांचे पर रचित एक कहानी कहने के लिए लिखा गया?
या फिर
यह उपन्यास आदिम भावनाओं को दर्शाते हुए प्रेम और उसकी प्राचीनता को रूपायित करने के लिए लिखा गया?
या फिर
यह उपन्यास एक मार्क्सवादी रचना है जिसमें मछुआरों के माध्यम से शोषित वर्ग की आवाज को बुलंद करने का कार्य किया गया है?
खैर, लेखक का उद्देश्य जो भी हो.. पाठक इसका वर्णन अपने अपने विचार और मनोदशा के आधार पर करते हैं | यूं तो इस उपन्यास में करूतम्मा और परीकुट्टी का प्रेम प्राधान्य रहा है किंतु अन्य भी कई समसामयिक मुद्दों, विषयों और सामाजिक वर्जनाओं को उपन्यास के अन्य गौण पात्रों चम्बन कुंजू,पप्पी कुंजू,नेला पल्लू,गंगादत्तन आदि के माध्यम से दर्शाने का सफल प्रयास किया गया है| जो इस उपन्यास को विशिष्ट रचना बनाती है|
दरअसल 'अरय' जाति पर आधारित यह उपन्यास प्रगतिवादी विशेषताओं को खुद में समाहित किए हुएँ नजर आता है, अरय लोगों की जीवनी,उनकी आर्थिक विपन्नता, सामाजिक शोषण,उचित शिक्षा का अभाव,रूढ़ियों का जकड़न और इन से मुक्ति पाने का संघर्ष इसे प्रगतिवाद के समकक्ष लाकर खड़ा कर देता है, जो इसे मलयालम साहित्य जगत में अमरत्व प्रदान करता है|
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