झूठा सच :विभाजन का वीभत्स रूप
आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रमुख कथाकार तथा प्रेमचंद जी के यथार्थवादी परंपरा के मार्ग को जारी रखने वाले,यशपाल जी का हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट स्थान है |मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित इनका संपूर्ण साहित्य वर्ग संघर्ष, समाज त्रासदी, मानव संघर्ष, रूढ़ी तथा परंपरा से जूझता हुआ नजर आता है| इनकी रचनाओं में मध्य वर्ग विशेष रूप से उभर कर सामने आया है| बात इनके सुप्रसिद्ध उपन्यास 'झूठा सच'की,की जाए या फिर इनकी कहानी 'खुदा और खुदा की लड़ाई 'की दोनों में हीं इन्होंने मध्यवर्गीय जीवन की विडंबनाओं को प्रस्तुत करने के साथ-साथ देश विभाजन के साथ ही सांप्रदायिकता की आग और दिमागी संकीर्णता को भी उजागर किया है|
यूं तो विभाजन और उसकी विभत्सा पर बहुत सारी रचनाएं हुई है,लेकिन यशपाल जी द्वारा रचित बहुचर्चित उपन्यास 'झूठा सच' का अपना एक अलग ही स्थान है|
' वतन और देश ' (1958) तथा 'देश का भविष्य '(1960) इन दो भागों में विभाजित यह उपन्यास हिंदी का सर्वोत्कृष्ट यथार्थवादी उपन्यास है| इसकी कहानी मूलतः 1947 के देश विभाजन पर आधारित है, विभाजन की त्रासदी और बेबस मानव के संघर्ष को जीवंत रूप में दर्शाते हुए मजहबी आग में रोटियां सेकने वालों का पर्दाफाश करना हीं इसका प्रमुख उद्देश्य है| तभी तो यशपाल जी स्वयं लिखते हैं_
" झूठा सच में सच को कल्पना से रंग कर उसी जन समुदाय को सौंप रहा हूं जो सदा झूठ से ठगा जा कर भी सच के लिए अपनी निष्ठा और उसकी ओर बढ़ने का साहस नहीं छोड़ता|"
यशपाल के उपन्यास झूठा सच में 1947 के दंगे का चित्र है| यह वह समय था जब भारत में खून खराबे का एक नया दौर शुरू हुआ, यह दौर था विभाजन का.......भारत और पाकिस्तान के विभाजन का| इस विभाजन के दौरान पाकिस्तान से बड़ी संख्या में हिंदुओं और सिक्खो ने भारत का रुख किया तो वहीं भारत से बड़ी संख्या में मुसलमान पाकिस्तान गए|
किंतु यह पलायन इतना सरल नहीं था- हिंसा,लूट,हत्या की घटनाओं ने दोनों तरफ के करोड़ों इंसानों को प्रभावित किया| यह ऐसी त्रासदी थी जिसमें मानवता भी शर्मसार हो गई |जो लोग कल तक एक दूसरे के शुभचिंतक थे वही विभाजन के साथ एक दूसरे के खून के प्यासे हो गए थे |हर तरफ केवल सांप्रदायिक दंगे की आग भड़क रही थी,और उसमें जल रही थी.....प्यार विश्वास और भाईचारे की वह भावना जिसने एक गुलाम मुल्क को आजादी दिलाई थी|
' झूठा सच ' उपन्यास की सम्पूर्ण कहानी जयपुरी उसकी प्रेमिका ,कनक तथा उसकी बहन, तारा के इर्द-गिर्द घूमती है और इन्हीं तीनों के द्वारा इस उपन्यास का विस्तृत फलक तैयार होता है| इन तीन मुख्य और कई गौण पात्रों के माध्यम से यशपाल ने विभाजन की त्रासदी को जीवंत रूप दिया है|
जयपुरी
मध्यमवर्ग का प्रतिनिधि पात्र है जो उपन्यास के प्रारंभ में,एक नायक, एक देशभक्त की भांति नजर आता है| वह राजनेताओं का पर्दाफाश करने के लिए संघर्षरत भी दिखाई पड़ता है,किंतु विभाजन पश्चात, वही परिस्थितियोंं से समझौता कर अपने नैतिक मूल्यों और सामाजिक कर्तव्यों की तिलांजलि दे बैठता है |अब उसे किसी पर हो रहे अत्याचार से कोई मतलब नहीं रहता| उसे अपनी बहन तारा के दोषी भी गुनहगार नजर नहीं आते,क्योंकि अब एक अवसरवादी राजनेता बन गया होता है |
तारा
तारा का चरित्र उपन्यास का सबसे सशक्त और सब से पीड़ित चरित्र नजर आता है वह इस बंटवारे की त्रासदी का दर्द एक आम नागरिक से अधिक एक स्त्री होने के कारण झेलती है, पति से अधिक पढ़ी लिखी स्त्री होने के कारण वह ससुराल में पति के हिंसा का शिकार होती है|विभाजन के समय उसे जबरन अगवा किया जाता है|उसका बलात्कार किया जाता है |उसके साथ हिंसा होती है,उसे शारीरिक और मानसिक यातनाएं दी जाती हैं | फिर भी वह हार नहीं मानती, जिंदगी को एक नए ढंग से शुरू करती है और केवल अपने अकेले के बलबूते पर वह एक ऊंचे सरकारी ओहदे पर भी पहुंचती है और अपने फैसले स्वयं लेती है| तारा के साथ होने वाले अत्याचार हमें मंटो की कहानियों ' ठंडा गोश्त' और ' खोल दो' के स्त्री पात्रों की याद दिलाते हैं|
कनक
कनक भी तारा की तरह एक सशक्त महिला है वह प्रगतिशील विचारों वाली महिला है, वह पुरी से प्रेम तो करती है लेकिन,पुरी के छल पूर्ण रवैये को बर्दास्त नहीं करतीं और उसका विरोध करती है|
इस तरह यह पूरा उपन्यास भिन्न-भिन्न पात्रों द्वारा भिन्न - भिन्न चरित्रों द्वारा भारतीय संस्कृति,भारतीय समाज,और भारतीय सोच को उजागर करता है| यह आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना की कल था,क्योंकि मजहबी आग में हम कल भी जल रहे थे और आज भी जल रहे हैं | आज धर्म की आड़ में राजनेताओं ने हमें कुछ इस तरह अंधा कर दिया है कि हम अपने धर्म के मूल उद्देश्य 'परहित सरिस धर्म नहिं भाई' से भटक , खून की नदियां बहा रहे हैं|
निष्कर्ष रूप में हम इस पूरे उपन्यास का आकलन डॉ रामविलास शर्मा जी के निम्नलिखित कथन के आधार पर कर सकते हैं-
"झूठा सच यशपाल जी के उपन्यासों में सर्वश्रेष्ठ है, उसकी गिनती हिंदी के नए पुराने श्रेष्ठ उपन्यासों में होगी- यह निश्चित है| यह उपन्यास हमारे सामाजिक जीवन का एक विशद चित्र उपस्थित करता है| इस उपन्यास में यथेष्ट करुणा है, भयानक और विभक्त दृश्यों की कोई कमी नहीं| श्रृंगार रस को यथासंभव मूल कथावस्तु की सीमाओं में बांधकर रखा गया है| हास्य और व्यंग ने कथा को रोचक बनाया है और उपन्यासकार के उद्देश्य को निखारा है|"
Comments
Post a Comment