उर्मिला

हिंदी साहित्य जगत के शाश्वत हस्ताक्षर द्विवेदीयुगीन रचनाकार मैथलीशरण गुप्त जी परिचय के मोहताज़ नहीं है...उनकी रचनाओं ने उन्हें अमर कर दिया है.. उन्होंने जितना कुछ लिखा जो लिखा वह अपनी एक अलग विशिष्टता रखता है , विशेषकर स्त्री जाति और समाज के बारे में | स्त्री से सम्बन्धित उनकी रचनाएँ तो कालजयी है..चाहे हम 'साकेत'की 'उर्मिला' की बात करें या 'पंचवटी' के कैकयी की या फिर 'यशोधरा' की सभी अपनी एक अलग विशिष्टता रखती हैं |

गुप्त जी ने मूलतः उन स्त्री पात्रों को चुना, जिनका त्याग, जिनका बलिदान महान तो हैं लेकिन उन पात्रों को महानता की परिधि में कभी रखा ना गया हैं | ऐसा नहीं है की इन पात्रों की भारतीय समाज में कोई पहचान नहीं थी ... अपितु अपनी  रचनाओं में इन पात्रों को पुनर्जीवित कर इनके ओझल हो रहीं पहचान को स्वर प्रदान कर  जनता में नवीन बोध का संचार करने का सार्थक प्रयास किया इस राष्ट्रकवी ने |

1933 में प्रकाशित तथा 12 सर्गो में विभक्त  'साकेत' महाकाव्य पूर्ण रूप से भारतीय नारी के  उदात् चरित्र का चित्रण है.. सीता, कैकयी विशेषकर उर्मिला के चरित्रों को उनके विशिष्ट रूप में रूपायित करता यह महाकाव्य, महाकाव्य जगत में अजोड़ है |आज हम मूलतः 'साकेत' की केंद्रीय पात्र उर्मिला की हीं बात करेंगे |

दरअसल, पति विरह में विदग्ध उर्मिला का जो वर्णन साकेत में गुप्त जी ने किया है, वह अन्यत्र दुर्लभ है,इस तरह की उर्मिला ना 'रामचरितमानस 'में दिखती है और ना हीं 'रामायण' में हीं |राम कथा मुख्य आधार होने पर भी 'साकेत' उर्मिला के मर्म को अधिक उजागर करता, इसी  कारण यह महाकाव्य  उर्मिला के प्रेम, उसके इंतज़ार और उसकी विरह दशा का जीवंत दस्तावेज बन जाता है | यह उपर्युक्त महाकाव्य की विशिष्टता हीं  है जो इसे नवीन रूप देती  |
 जैसा कि हम जानते है कि गुप्त जी अपने युगीन और  समाजिक समस्याओं  के प्रति गंभीर रहते थे अतः उनकी रचनायो में नारी समस्या का चित्रण स्वाभिक सी बात है.. उर्मिला केवल गुप्त जी के किसी रचना विशेष की पात्र मात्र नहीं है अपितु वह प्रतिनिधित्व है भारतीय नारी का, भारतीय अस्मिता का, भारतीय संस्कृति का.. चुंकि परिवार का मूल आधार स्त्री होती है, उसके बिना परिवार तीतर बितर हो जाता अतः गुप्त जी ने स्त्री कि महता को स्वीकार करते हुए, मर्यादावादी दृष्टि के साथ उन्हीं गुणों की स्थापना की है जो भारतीय कुलवधु के प्रमुख गुण माने गएँ है |

गुप्त जी की उर्मिला इसी आदर्श की प्रतिमा है जिसने सभी कार्यभार को अपने ऊपर लेते हुए,स्वयं को कर्तव्य की वेदी पर चढ़ा दिया है और अपनी परवाह किये बिना अपने पति की प्रतीक्षा में लीन है | 
      
        अपने अतुलित कुल में,
प्रकट हुआ था कलंक जो काला
        वह उस कुल बाला ने,
अश्रु सलिल से समस्त धो डाला

  दरअसल उर्मिला ने कभी स्वयं को लक्ष्मण से अलग समझां हीं नहीं तभी तो ओं कहती हैं -

मिथिला मेरा मूल है,और अयोध्या फूल,
चित्रकूट को क्या कंहू, रह जाती हूँ भूल |

उर्मिला विवश है वह पति के साथ वन जा ना सकी, यह चौदह वर्ष उसे केवल स्मृतियों के सहारे काटने हैं, जो उसे पल पल विदग्ध कर रहीं लेकिन फिर भी त्याग और तप के साथ वह अपने कर्तव्य पथ पर डंटी रहती हैं.उसने स्वयं को अपने पति में लीन कर लिया हैं उसे अपना जरा भी ख्याल नहीं लेकिन सेवा मार्ग से वह एक कदम भी पीछे नहीं हटी हैं... वह जी जान लगा कर अपने परिवार की सेवा में जुटी हैं . यह हैं भारतीय नारी  का स्वरुप.. जिसने परिस्थितियों से घबड़ा कर कभी हार नहीं माना |

निष्कर्ष रूप में हम यही कह सकते हैं कि, गुप्त जी ने उर्मिला और उसके धैर्य को रेखांकित कर भारतीय समाज के सम्मुख एक आदर्श को प्रस्तुत किया हैं.. यह आदर्श स्त्री और पुरुष दोनों के लिए अनुगामी है,केवल स्त्रियों के लिए नहीं ...स्त्रिया तब तक 'उर्मिला' नहीं बन सकती ज़ब तक पुरुष 'लक्ष्मण' से ना हों, और पुरुष भी तब तक लक्ष्मण ना हों सकते ज़ब तक स्त्रियां उर्मिला जैसी ना हों |इस तरह पारिवारिक सामंजस्य स्थापित करने का सम्पूर्ण प्रयास हीं 'साकेत' और उसकी भीतर स्थित 'उर्मिला' का चरित्र है | इस सन्दर्भ में  हजारी प्रसाद द्विवेदी जी कि निम्न टिप्पणी उल्लेखनीय है _
"मैथलीशरण गुप्त ने सम्पूर्ण भारतीय पारिवारिक वातावरण में उद्यात चरित्रों का निर्माण किया है,उनके काव्य शुरू से अंत तक प्रेरणा देने वाले हैं | उनमे व्यक्तित्व का स्वतः समुच्छीत उच्छवास नहीं है | पारिवारिक व्यक्तित्व का और संयत जीवन का विलास है |"





 

Comments

Popular posts from this blog

अनुवादक के गुण

तुलसी की कवितावली

वेद से बौद्ध तक