आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी

उपन्यासकार, साहित्यकार, इतिहासकार, आलोचक के रूप में विख्यात आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी हिंदी साहित्य जगत के मूर्धन्य हस्ताक्षर हैं |
परम्परा और नविनता के सामंजस्यवादी धरातल पर खड़ा द्विवेदी जी का सम्पूर्ण सृजन एक नई दृष्टिकोण का सूचक हैं, जो उन्हें परवर्ती और पूर्ववर्ती साहित्यकारो की कतार से अलग करता  हैं |
बलिया जिले में जन्मे आचार्य द्विवेदी के बचपन का नाम 'वैद्यनाथ द्विवेदी 'था | पारिवारिक प्रभाव के कारण ये संस्कृत और ज्योतिष के अच्छे ज्ञाता हो गयें, हिंदी तथा अन्य क्षेत्रो में इनकी पकड़ तो मजबूत थी हीं |जीवन का प्रारम्भ इन्होने शांतिनिकेतन में अध्यापन के साथ शुरू किया | धीरे - धीरे इन्होने लेखनी के स्वतंत्र प्रयोग द्वारा साहित्य के क्षेत्र में अपनी धाक जमा ली | इन्होने जंहा 'कुटज ', शिरीष के फूल 'आदि निबंधों की रचना की वंही हिंदी साहित्य को एक नई दिशा देते हुए 'सूर साहित्य', 'हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास', 'हिंदी साहित्य की भूमिका' आदि कई रचनाएँ की | इनके अलावा भी 'अनामदास का पोथा', 'पुन्नार्रवा' आदि रचनाएँ की है |
अब तक जो कुछ भी था हिंदी साहित्य में उसे शुक्ल जी के पैमाने पर मापा - तौला जाता था लेकिन द्विवेदी जी ने एक नए नज़रिये के साथ साहित्य के निरिक्षण की परिपाटी बदल दी | ऐसा नहीं है कि द्विवेदी जी ने शुक्ल जी का विरोध किया है, उन्होंने तो केवल कुछ बिन्दुओ पर शुक्ल जी से असहमति के कारण  एक नई दृष्टिकोण की सृष्टि की है | कुछ प्रमुख बिन्दुएं इस प्रकार है जंहा शुक्ल जी और द्विवेदी जी के कथनों में परस्पर विरोधाभाष है _

1.जिसे शुक्ल जी वीरता प्रवृत्ति प्रधान्य के कारण 'वीरगाथाकाल' कहते हैं, उसे हीं द्विवेदी जी हिंदी साहित्य की उत्पत्ति के कारण 'आदिकाल' कहकर सम्बोधित करते हैं|

2. दूसरा मतभेद सिद्ध और नाथ साहित्य को लेकर उभरता है,... सिद्ध और नाथ साहित्य को जंहा शुक्ल जी केवल एक सम्प्रदाय विशेष का कथन मात्र कहकर साहित्य की परिधि से बाहर कर देते हैं, वहीं द्विवेदी जी सिद्ध और नाथ के साहित्य को हिंदी साहित्य का एक विशेष अंग मानते हुए, भक्तिकाल के साहित्य का हवाला देते हैं |

3. तीसरा स्थान जंहा पुनः दोनों विचारकों की धारणाएं टकरायीं हैं, ओं है कबीर और उनकी रचनाएँ |
शुक्ल जी ने जिस कबीर की ओर ध्यान भी ना दिया ठीक से,उस कबीर को कबीरत्व प्रदान किया हजारी प्रसाद द्विवेदी ने, इन्होने ना केवल कबीर के अक्खड़पन को पहचाना अपितु उनकी भाषिक शैली को भी समझा और उन्हें ' भाषा की डिक्टेटर ' की उपमा से नवाज़ा भी | इतना हीं नहीं  कबीर पर उन्होंने एक पूरी पुस्तक लिख कबीर को साहित्य जगत में अमर भी कर दिया |

निष्कर्ष रूप में हम यही कह सकते हैं की शुक्ल जी ने जिस साहित्यऐतिहास की रचना कर हमें अपनी संस्कृति अपने पूर्वजो से परिचित कराया द्विवेदी जी ने उसी साहित्यऐतिहास को और अधिक मांझ कर हमें सत्य के समीप पंहुचा दिया | यही कारण है कि दोनों विद्वान अपनी विशिष्ट दृष्टि के कारण अपनी एक विशिष्ट पहचान रखते हैं, दरअसल दोनों मिलकर साहित्य कि कड़ी को जोड़ते हैं, एकदूसरे का विरोध नहीं करतें |

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