घनानंद

'अती सुधो स्नेह को मारग है, जंहा नेकू सयानप बांक नहीं.....'

प्रेम की ऐसी सुन्दर अभिव्यंजना करने वाले रितिकालीन कवि घनानंद का हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट स्थान है |
इन्होने ना केवल प्रेम को समझा अपितु विलासिता में डूबे हुए समाज को प्रेम की एक अलग परिभाषा से परिचित भी करवाया | सटीक शब्दों में कंहे तो घनानंद प्रेमी हीं नहीं आदर्श प्रेम के सूत्रधार भी हैं |
गांभिर्य और पवित्र और निश्छल भावों से लबालब घनानंद का प्रेम तथा उनका काव्य सही मायने में तदयुगीन परिस्थितियों एवं तदयुगीन साहित्यकारों में अपवाद रहा है |
  जीवन में पीड़ा और प्रेम में धिक्कार पाने के बाद भी वें टूटे नहीं, प्रेम का सम्बल लिए आगे बढ़ते रहें और एक स्थिति ऐसी आयी कि उनका प्रेम लौकिक से अलौकिक की सीमा तक पहुंच गया, अर्थात प्रेम ज़ब अनंत हो गया, रोम -रोम संत हो गया |
दरअसल,उन्होंने प्रेम की अपनी परिपाटी बनाई | साहित्य रचना में भी किसी का अनुकरण ना कर अपने हृदयगत भावों को ज्यों का त्यों परोसा | छल, कपट और वासना से रहित उनका काव्य समर्पण और  विश्वास का मूर्त रूप है |

एकतरफा प्रेम होने के कारण घनानंद का प्रेम उन्हीं के लिए पीड़ादायक होने लगा लेकिन इस पीड़ा में भी उन्होंने आनंद को ढूंढ़ निकाला.....
उनकी कविताओं में प्रेम का जो मार्मिक वर्णन मिलता है उससे अवश्य हीं पाठक ह्रदय भावुक हो जाता है, लेकिन प्रेम का यह मर्म हीं घनानंद और उनके काव्य की विशिष्टता बन जाता है... इस तरह उन्होंने प्रेम की एकनिष्ठाता पर बल देते हुए काव्य में जो गहरी प्रमाणिक अनुभूतियां अभिव्यक्त की हैं, निश्चय हीं वें बेजोड़ हैं |

रितिकालीन साहित्य में जंहा अश्लीलता,श्रृंगारीकता, नख -सिख जैसे साहित्यो की होड़ मची थी, जंहा नायिका रूप में स्त्री की मिट्टी खूब पलिद की की जा रहीं थी, जंहा श्रृंगारीकता केवल स्थूल मांसलता का पर्याय बन चुकी थी, वंहा घनानंद और उनकी रचनाएँ जोरदार तमाचा थी उस साहित्य और समाज पर जिसने प्रेम के सही अर्थो को समझे बिना प्रेम की बेढंगी छवि तो प्रस्तुत की हीं साथ हीं साथ स्त्री जाति को भी अपमानित करने का हर भरसक प्रयास किया |

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