हिंदी और हिंदुस्तान
भाषा ना केवल विचार - विनिमय अपितु संस्कृतियों के आदान -प्रदान का भी साधन है | और भारत जैसे विशाल देश में जंहा भिन्न - भिन्न संस्कृतियों के लोग रहते वंहा तो भाषा का महत्व कुछ अधिक बढ़ जाता है |
हिंदुस्तान ने हिंदी को लेकर लड़ाईया लड़ी है.. हिंदी की श्रेष्ठता स्थापित करने का हर भरसक प्रयास किया है, लेकिन फिर भी आज हिंदुस्तान में हिंदी परायी सी है |
आखिर ऐसा क्यूँ?
आज आज़ादी के 73 वर्षो बाद भी हमें भाषायी आज़ादी क्यूँ नहीं मिली? क्यों हम एक देश एक संविधान की बात करते हैं लेकिन भाषा के प्रश्न पर मूक दर्शक बन जाते हैँ?
अंग्रेजों की अंग्रेजी को हमने अपनाना शुरू कर दिया हैँ या ठीक- ठीक कहे तो अंग्रेजी को आत्मसात कर लिया हैँ लेकिन हिंदी से अभी भी कन्नी काटना जारी है |
कुछ लोगो का मानना है कि भाषा को लेकर बहस करना या विवाद करना कोई मुद्दा नहीं है, देश में अन्य भी मुद्दे है जो अधिक जरूरी हैं, शायद उनलोगो को देश के भविष्य से कोई मतलब नहीं है इसीलिए तो वें ऐसा कहते है ना !आए दिन अखबारों में छात्र -छात्राओं के आत्महत्या सम्बन्धि खबरें छपति रहती है जिनमें भाषा की विविधता को आत्महत्या का कारण बताया गया होता है.. उन्हें ना ऐसे बच्चो की फ़िक्र है और ना हीं देश के प्रगति की तभी तो भाषा उनके लिए कोई मुद्दा नहीं है |
आज हम जितने भी विकसित देशो की बात करे, उन सभी देशों की अपनी एक विशिष्ट भाषा है, बिना भाषा के कोई भी देश प्रगति नहीं कर सका है अतः भारत भी यदि विकासशील से विकसित की स्थिति में आना चाहता है तो उसे भी एक देश एक भाषा जैसे नियम को अपनाना होगा, तभी उसकी वास्तविक उन्नति होगी नहीं तो अंग्रेजों ने तो हमें कल गुलाम बनाया हीं था भविष्य में भी हम उनकी गुलामी से ना बच पाएंगे |
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